नई दिल्ली। लोकसभा में एंटी पेपर लीक विधेयक पर चर्चा के दौरान परीक्षा सुधारों और युवाओं के भविष्य को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। हालांकि इस बहस की सबसे खास बात यह रही कि दोनों पक्षों के सांसदों ने पहली बार बड़ी संख्या में Gen Z की भाषा और लोकप्रिय स्लैंग का इस्तेमाल किया। सदन में "क्लॉक्ड इट" और "डिलूलू" जैसे शब्दों की गूंज सुनाई दी।
बहस के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वे नई पीढ़ी की सोच, भाषा और अपेक्षाओं को बेहतर ढंग से समझते हैं। दोनों ही पक्ष युवाओं का भरोसा जीतने और उन्हें अपने पक्ष में दिखाने का प्रयास करते नजर आए।
प्रियंका गांधी ने सरकार पर साधा निशाना
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने कहा कि केवल विपक्ष को दोषी ठहराने या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप लगाने से युवाओं का विश्वास नहीं जीता जा सकता। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में Gen Z का भरोसा जीतना चाहती है तो केवल नए-नए कैमरा एंगल से वीडियो बनाने से काम नहीं चलेगा।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा, "प्रधानमंत्री जी को कैमरे का एंगल नहीं, दिल का एंगल बदलना पड़ेगा।" प्रियंका ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी जागरूक है, सच और झूठ में फर्क करना जानती है और उसे केवल ईमानदार प्रयासों से ही विश्वास में लिया जा सकता है।
बांसुरी स्वराज बोलीं- 'PM मोदी क्लॉक्ड इट'
भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज ने भी चर्चा के दौरान Gen Z के लोकप्रिय शब्द "क्लॉक्ड इट" का इस्तेमाल किया। उन्होंने परीक्षा प्रणाली में सुधारों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समय रहते सही कदम उठाए हैं। Gen Z की भाषा में "क्लॉक्ड इट" का अर्थ किसी काम को बिल्कुल सही तरीके से करना या शानदार प्रदर्शन करना माना जाता है।
तेजस्वी सूर्या ने विपक्ष को बताया 'डिलूलू'-भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने कहा कि Gen Z ने सरकार से सवाल पूछकर और जवाबदेही तय कर लोकतंत्र को मजबूत किया है। उन्होंने युवाओं को सलाम करते हुए कहा कि सरकार उनकी आवाज सुन रही है।
सूर्या ने विपक्ष पर कटाक्ष करते हुए कहा कि "इससे बड़ा डिलूलू (भ्रम) कुछ नहीं हो सकता कि विपक्ष यह समझे कि पूरा युवा वर्ग उसके साथ खड़ा है।"
सुप्रिया सुले का पलटवार-तेजस्वी सूर्या के बयान का जवाब देते हुए एनसीपी (शरद पवार) की सांसद सुप्रिया सुले ने कहा कि भाजपा भी इस भ्रम में न रहे कि देश की पूरी युवा पीढ़ी उसके साथ है। उन्होंने कहा कि युवाओं का फैसला वर्ष 2029 के आम चुनाव में सामने आ जाएगा।
सुप्रिया सुले ने यह भी कहा कि संसद कोई "डिक्शनरी प्रतियोगिता" नहीं है, जहां यह साबित किया जाए कि कौन कितने नए स्लैंग शब्दों का इस्तेमाल कर सकता है। उनके अनुसार, असली मुद्दा युवाओं के भविष्य और परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।
युवाओं की भाषा बनी राजनीतिक हथियार- एंटी पेपर लीक बिल पर हुई चर्चा ने यह संकेत दिया कि अब राजनीतिक दल केवल नीतियों के जरिए ही नहीं, बल्कि युवाओं की भाषा और संवाद शैली अपनाकर भी उन्हें जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि विपक्ष ने सरकार के दावों पर सवाल उठाए, जबकि सत्ता पक्ष ने परीक्षा सुधारों को अपनी उपलब्धि बताते हुए युवाओं का विश्वास जीतने का दावा किया। सदन में Gen Z की भाषा का बढ़ता इस्तेमाल इस बात का संकेत माना जा रहा है कि आने वाले समय में राजनीति में युवाओं की भूमिका और प्रभाव पहले से अधिक महत्वपूर्ण रहने वाला है।





